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पंचायती राज व्यवस्था कल और आज

सामान्य अध्ययन पेपर – 2 ( राज्य व्यवस्था)

पंचायती राज व्यवस्था कल और आज

आज से बीस वर्ष पहले वर्ष 1992-93 में संविधान के 73 वें संशोधन के बाद देश भर में निश्चित तौर पर पंचायत राज व्यवस्था को लागू किया गया। दो दशकों में पंचायत राज व ग्रामीण विकेंद्रीकरण ने कितनी प्रगति किया है, इस सवाल का जवाब तो देश भर के पंचायतो का सही मूल्यांकन से ही मिलेगा या इस व्यवस्था में जुड़े जन प्रतिनिधियो के कार्यो के ग्राम जन जीवन में क्या बदलाव आया है , इसे भी समझ कर हम इस स्थानीय व्यवस्था के बारे में जान सकते है। तो जानते है पंचायतो के कल और आज को ….

 आजादी के बाद पंचायती राज व्यवस्था

आजादी के समय देश में पंचायत व्यवस्था का अभाव था । स्वतंत्रताप्राप्ति के पश्चात् इस व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के सक्रिय प्रयास आरंभ हुए। 2 अक्टूबर 1952  में नेहरू जी द्वारा पंचायती राज और सामुदायिक विकास मंत्रालय के तात्वाधन में सामुदायिक विकास कार्यक्रम का आरम्भ किया गया।  1957 में सामुदायिक विकास कार्यक्रम के जाँच करने और पंचायती राज से जुडी बातो को खोजने के लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया ।  1957  के अंत में  बलवंत राय मेहता समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सामुदायिक विकास कार्यक्रम की मूल कमी यह रही है कि जनता का इसका सहयोग प्राप्त नही हुआ। जब तक स्थानीय नेताओ को अधिकार नही मिलाता है , तब तक इस तरह कि कोई कार्यक्रम सफल नही हो पायेगी। इसलिए विकेंद्रीकरण और सामुदायिक विकास कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओ की स्थापना की जनि चाहिए । बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश पर 2 अक्टूबर 1959 को नागौर ( राजस्थान ) से पंचायती राज संस्थाओ का श्रीगणेश हुआ। इसके बाद 1959 में आन्ध्र प्रदेश, 1960 में असम, तमिलनाडु एवं कर्नाटक, 1962 में महाराष्ट्र, 1963 में गुजरात तथा 1964 में पश्चिम बंगाल में विधानसभाओं के द्वारा पंचायती राज अधिनियम पारित करके पंचायत राज व्यवस्था को प्रारम्भ किया गया।

बलवंत राय मेहता समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर स्थापित पंचायती राज व्यवस्था में कई कमियाँ उत्पन्न हो गयीं, जिन्हें दूर करने के लिए सिफ़ारिश करने हेतु 1977 में अशोक मेहता समिति का गठन किया गया। इस समिति में 13 सदस्य थे। समिति ने 1978 में अपनी रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी, जिसमें केवल 132 सिफ़ारिशें की गयी थीं। 1985 में डॉ. पी. वी. के. राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करके उसे यह कार्य सौंपा गया कि वह ग्रामीण विकास तथा ग़रीबी को दूर करने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था पर सिफ़ारिश करे। इस समिति ने राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद्, ज़िला स्तर पर ज़िला परिषद्, मण्डल स्तर पर मण्डल पंचायत तथा गाँव स्तर पर गाँव सभा के गठन की सिफ़ारिश की। इस समिति ने विभिन्न स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा जनजाति एवं महिलाओं के लिए आरक्षण की भी सिफ़ारिश की, लेकिन समिति की सिफ़ारिश को अमान्य कर दिया गया।

पंचायती राज संस्थाओं के कार्यों की समीक्षा करने तथा उसमें सुधार करने के सम्बन्ध में सिफ़ारिश करने के लिए सिंधवी समिति का गठन किया गया। इस समिति ने ग्राम पंचायतों को सक्षम बनाने के लिए गाँवों के पुनर्गठन की सिफ़ारिश की तथा साथ में यह सुझाव भी दिया कि गाँव पंचायतों को अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद 1988 में पी. के. थुंगन समिति का गठन पंचायती संस्थाओं पर विचार करने के लिए किया गया। इस समिति ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि राज संस्थाओं को संविधान में स्थान दिया जाना चाहिए। इस समिति की सिफ़ारिश के आधार पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने के लिए 1989 में 64वाँ संविधान संशोधन लोकसभा में पेश किया गया, जिसे लोक सभा के द्वारा पारित कर दिया गया, लेकिन राज्य सभा के द्वारा नामन्ज़ूर कर दिया गया। इसके बाद लोकसभा को भंग कर दिए जाने के कारण यह विधेयक समाप्त कर दिया गया। इसके बाद 16 दिसम्बर, 1991 को 72वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जिसे संयुक्त संसदीय समिति (प्रवर समिति) को सौंप दिया गया। इस समिति ने विधेयक पर अपनी सम्मति जुलाई 1992 में दी और विधेयक के क्रमांक को बदलकर 73वाँ संविधान संशोधन विधेयक कर दिया गया, जिसे 22 दिसम्बर, 1992 को लोकसभा ने तथा 23 दिसम्बर, 1992 को राज्यसभा ने पारित कर दिया। 17 राज्य विधान सभाओं के द्वारा अनुमोदित किय जाने पर इसे राष्ट्रपति की सम्मति के लिए उनके समक्ष पेश किया गया। राष्ट्रपति ने 20 अप्रैल, 1993 को इस पर अपनी सम्मति दे दी और इसे 24 अप्रैल, 1993 को प्रवर्तित कर दिया गया। आज देश के सभी राज्यों में पंचायती राज्य व्यवस्था लागू है।  भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के वार्षिक रिपोर्ट 2011 के आकड़ो के अनुसार देश के 625  जिलो के 6500 ब्लाको में 2,50,000 पंचायते सूचना प्रणाली से जुडी हुई है। अब राज्य सरकार और केंद्र सरकार की सरकारी योजनाओ की खबर पंचायतो में सीधे पहुचता हैं। इस समय देश में लगभग 34 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि त्रि-स्तरीय पंचायत राज में मौजूद हैं। जिनमें से लगभग 12 लाख महिलाएं हैं। जल्द ही महिलाओं के लिए पंचायतो में आरक्षण बढ़ने की उम्मीद है कि जिससे उनकी संख्या त्रि-स्तरीय पंचायत राज में  17 से 18 लाख के आसपास पहुंच जाएगी। इस तरह देश के स्थानीय शासन व्यवस्था में पुरुषो के साथ साथ महिलाओ का भी अहम भी योगदान है।

 

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One comment

  1. Sir uniform civil code and triple talaq pr hindi me likhiye

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