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बक्सर का युद्ध

इतिहास के पन्नो से… ऐतिहासिक युद्ध-16

बक्सर का युद्ध 

भारतीय इतिहास के उन युद्ध में बक्सर युद्ध का भी विशेष स्थान है, जिसके कारन देश में शासन काल ही बदल गया। इस युद्ध के बाद भारत देश का इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा, साथ ही देश में पूरी तरह देश शासको का दबदबा ख़त्म हो गया, और सत्ता का तख्ता पूरी तरह अंग्रेजो के हवाले हो गया।  यह युद्ध बक्सर में ईस्ट इंडिया कंपनी और मुगल नबाबों के बीच लड़ा गया।

बक्सर का युद्ध 1763 ई. के शुरूआती महीनो से ही आरम्भ हो चुका था, किन्तु मुख्य रूप से यह युद्ध 22 अक्तूबर, सन् 1764 ई. में लड़ा गया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा बंगाल के नवाब मीर क़ासिम के मध्य कई झड़पें हुईं, जिनमें मीर कासिम पराजित हुआ। फलस्वरूप वह भागकर अवध आ गया और शरण ली। मीर कासिम ने यहाँ के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय के सहयोग से अंग्रेज़ों को बंगाल से बाहर निकालने की योजना बनायी, किन्तु वह इस कार्य में सफल नहीं हो सका। अपने कुछ सहयोगियों की गद्दारी के कारण वह यह युद्ध हार गया। आपसी फूट व विद्वेष के कारण हुई भारतीय संयुक्त सेना की हार के बाद अंग्रेजों का मनोबल बहुत बढ़ गया। इस के साथ ही देश का इतिहास को ही नहीं वरन भूगोल की परिधि को भी बदल कर रख दिया।  युद्ध के उपरांत  ऐसा तख्त पलटा कि पूरे हिंदुस्तान पर लगभग दो वर्षो तक अंग्रेजों ने शासन कायम रखा।

इस युद्ध में एक ओर मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध का नवाब शुजाउद्दौला तथा मीर क़ासिम थे, दूसरी ओर अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व उनका कुशल सेनापति ‘कैप्टन मुनरो’ कर रहा था। दोनों सेनायें बिहार मेंबलिया से लगभग 40 किमी. दूर ‘बक्सर’ नामक स्थान पर आमने-सामने आ पहुँचीं। 22 अक्टूबर, 1764 को ‘बक्सर का युद्ध’ प्रारम्भ हुआ, किन्तु युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही अंग्रेज़ों ने अवध के नवाब की सेना से ‘असद ख़ाँ’, ‘साहूमल’ (रोहतास का सूबेदार) और जैनुल अबादीन को धन का लालच देकर अलग कर दिया। लगभग तीन घन्टे में ही युद्ध का निर्णय हो गया, जिसकी बाज़ी अंग्रेज़ों के हाथ में रही।

शाह आलम द्विताय तुरंत अंग्रेज़ी दल से जा मिला और अंग्रेज़ों के साथ सन्धि कर ली। मीर क़ासिम भाग गया तथा घूमता-फिरता ज़िन्दगी काटता रहा। दिल्ली के समीप 1777 ई. में अज्ञात अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई।

ऐसा माना जाता है कि, बक्सर के युद्ध का सैनिक एवं राजनीतिक महत्व प्लासी के युद्ध से अधिक है । मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, बंगाल का नवाब मीर क़ासिम एवं अवध का नवाब शुजाउद्दौला, तीनों अब पूर्ण रूप से कठपुतली शासक हो गये थे। उन्हें अंग्रेज़ी सेना के समक्ष अपने बौनेपन का अहसास हो गया था। थोड़ा बहुत विरोध का स्वर मराठों और सिक्खों मे सुनाई दिया, किन्तु वह भी समाप्त हो गया। निःसन्देह इस युद्ध ने भारतीयों की हथेली पर दासता शब्द लिख दिया, जिसे स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद ही मिटाया जा सका।

बक्सर के युद्ध के बारे में इतिहासकारो ने कहा है कि-प्लासी की अपेक्षा बक्सर को भारत में अंग्रेज़ी प्रभुता की जन्मभूमि मानना कहीं अधिक उपयुक्त है।

बक्सर निवासी और समाजसेवी का कहना है कि आज भी बक्सर में एस युद्ध का साक्ष्य मौजूद है , इस लड़ाई को जीतने के बाद लड़ाई स्थल कतकौली मैदान में एक विशाल विजय स्तूप का निर्माण किया गया था। जिस पर उन्होंने अंग्रेजी, बंगाली, उर्दू व हिंदी भाषाओं में अपनी जीत का प्रमाणिक शिलालेख भी स्थापित किया था। युद्ध मैदान में  मुगल सैन्य अधिकारियों की कब्र व अंग्रेजों द्वारा निर्मित विजय स्तूप साथ ही यत्र-तत्र बिखरे पड़े पत्थर आज भी मौजूद है।

  

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