सफलता,सौभाग्य,शांति एवं आस्था का प्रतीक : स्वास्तिक

Written by Editor on मई 16, 2018 in category Uncategorized | 3376 Views

भारतीय सभ्यता और संस्कृति { प्रतीक चिन्ह }

दूसरे देशों में स्वस्तिक का प्रचार महात्मा बुद्ध की चरण पूजा से बढ़ा है। मिस्र के प्राचीन ट्राय शहर की पुरातात्विक खुदाई में प्राप्त मिट्टी की बर्तन एवं सिक्कों में भी स्वास्तिक चिन्ह मिला है, जो बताता है कि यह प्रतीक चिन्ह कितनी पुरानी है । द्वितीय विश्व युद्ध के समय एडोल्फी हिटलर ने उल्टे स्वास्तिक का चिन्ह अपनी सेना के प्रतीक रूप में शामिल किया था। सभी सैनिकों की वर्दी एवं टोपी पर यह उल्टा स्वास्तिक चिन्ह अंकित था।

स्वस्तिक शब्द सू + उपसर्ग अस् धातु से बना है। सु अर्थात अच्छा, श्रेष्ठ, मंगल एवं अस् अर्थात सत्ता। यानी कल्याण की सत्ता, मांगल्य का अस्तित्व । स्वस्तिक को हिन्दू धर्म ने ही नहीं, बल्कि विश्व के सभी धर्मों ने परम पवित्र माना है। स्वास्तिक का निशान भारत के अलावा विश्व अन्य देशों में भी प्रयोग में लाया जाता है, जर्मन देश में इसे राजकीय चिन्ह से शोभायमान किया गया है, अन्ग्रेजी के क्रास में भी स्वास्तिक का बदला हुआ रूप मिलता है । स्वास्तिक बनाने के लिए धन चिन्ह बनाकर उसकी चारों भुजाओं के कोने से समकोण बनाने वाली एक रेखा दाहिनी ओर खींचने से स्वास्तिक बन जाता है। स्वस्तिक को किसी भी स्थिति में रखा जाए, उसकी रचना एक-सी ही रहेगी।

@ स्वस्तिक का वैज्ञानिक आधार :- विज्ञान के अनुसार, पॉजिटिव तथा नेगेटिव दो अलग-अलग शक्ति प्रवाहों के मिलनबिन्दु को प्लस (+) कहा गया है, जो कि नवीन शक्ति के प्रजनन का कारण है। प्लस को स्वस्तिक चिह्न् का अपभ्रंश माना जाता है, जो सम्पन्नता का प्रतीक है। स्वस्तिक चिह्न् कों गणित में + चिह्न् माना गया है। वैज्ञानिक नियमो के अनुसार स्वस्तिक बनाने के लिए रेखा खींचने का कार्य ऊपरी भुजा से प्रारम्भ करना चाहिए। इसमें दक्षिणवर्त्ती गति होती है। सदैव कुंकुम, सिन्दूर व अष्टगंध से ही अंकित करना चाहिए। वैज्ञानिक हार्टमेण्ट अनसर्ट ने आवेएंटिना नामक यन्त्र द्वारा लाल कुंकुम से अंकित स्वास्तिक की सकारात्मक ऊर्जा को 100000 बोविस यूनिट में नापा है।

@ वास्तुशास्त्र में स्वस्तिक :- स्वस्तिक वास्तुशास्त्र में अति विशेष महत्व रखता है, वास्तु के जानकार इसे वास्तुशास्त्र का मूल चिह्न् मानते है। घर को बुरी नजर से बचाने व उसमें सुख-समृद्धि के वास के लिए मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वस्तिक चिह्न् बनाया जाता है। स्वस्तिक चक्र की गतिशीलता बाईं से दाईं ओर है। इसी सिद्धान्त पर घड़ी की दिशा निर्धारित की गयी है। पृथ्वी को गति प्रदान करने वाली ऊर्जा का प्रमुख स्रोत उत्तरायण से दक्षिणायण की ओर है। इसी प्रकार वास्तुशास्त्र में उत्तर दिशा का बड़ा महत्व है। इस ओर भवन अपेक्षाकृत अधिक खुला रखा जाता है, जिससे उसमें चुम्बकीय ऊर्जा व दिव्य शक्तियों का संचार रहे। वास्तुदोष क्षय करने के लिए स्वस्तिक को बेहद लाभकारी माना गया है एवं इसे दिशाओं का ज्ञान करवाने वाला शुभ चिह्न् भी कहा जाता है। मुख्य द्वार के ऊपर सिन्दूर से स्वस्तिक का चिह्न् बनाना चाहिए। कहते है कि घर में जहां-जहां वास्तुदोष हो, वहां स्वस्तिक बनाने से वास्तुदोष दूर हो जाता है।

@ स्वस्तिक की महिमा :- हर शुभ कार्य की शुरुआत स्वस्तिक बनाकर ही की जाती है। यह मंगलभावना एवं सुख सौभाग्य का द्योतक है। इसे सूर्य और विष्णु का प्रतीक माना जाता है। ऋग्वेद में स्वस्तिक के देवता सवृन्त का उल्लेख है। सविन्त सूत्र के अनुसार इस देवता को मनोवांछित फलदाता सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है। हिंदू व्यापारियों के बहीखातों पर स्वस्तिक चिह्न् बना होता है। जब इसकी कल्पना गणेश रूप में हो तो स्वस्तिक के दोनों ओर दो सीधी रेखाएं बनायी जाती हैं, जो शुभ-लाभ एवं ऋद्धि-सिद्धि की प्रतीक हैं। हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार, अभिमंत्रित स्वस्तिक रूप गणपति पूजन से घर में लक्ष्मी की कमी नहीं होती। स्वस्तिक कों ब्रम्हाण्ड का प्रतीक माना जाता है और कहा जाता है कि यह चिन्ह नकारात्मक ऊर्जा कों सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करता है। इसका भरपूर प्रयोग अमंगल व बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। इसे मनोवांछित फलदाता, सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा जाता है।

@ ऐतिहासिक शुभ का प्रतीक चिन्ह है स्वस्तिक :- तिहासिक साक्ष्यों में स्वस्तिक का महत्व भरा पड़ा है। आदिकाल से आधुनिक काल तक स्वस्तिक का गौरवान्वित इतिहास है । हड़प्पा व मोहन जोदड़ों सभ्यता-संस्कृति से लेकर अशोक के शिला लेखों तक एवं रामायणकाल से लेकर महाभारतकाल तक स्वस्तिक का अनेक बार उल्लेख मिलता है। दूसरे देशों में स्वस्तिक का प्रचार महात्मा बुद्ध की चरण पूजा से बढ़ा है। मिस्र के प्राचीन ट्राय शहर की पुरातात्विक खुदाई में प्राप्त मिट्टी की बर्तन एवं सिक्कों में भी स्वास्तिक चिन्ह मिला है, जो बताता है कि यह प्रतीक चिन्ह कितनी पुरानी है । द्वितीय विश्व युद्ध के समय एडोल्फी हिटलर ने उल्टे स्वास्तिक का चिन्ह अपनी सेना के प्रतीक रूप में शामिल किया था। सभी सैनिकों की वर्दी एवं टोपी पर यह उल्टा स्वास्तिक चिन्ह अंकित था।

@ हर धर्म में शुभ का प्रतीक है स्वास्तिक:- हिंदू, बौद्ध एवं जैन धर्म में स्वास्तिक को शुभ माना गया है। भारत के अलावा नेपाल, चीन,तिब्बत, जापान एवं दक्षिणी यूरोप के देशों में स्वास्तिक को शुभकामना और समृद्धि के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जाता है। हिन्दू धर्म में स्वस्तिक कों गणपति, विष्णु व श्री का प्रतीक चिह्न् माना गया है। ऐसा धारणा है कि स्वस्तिक की चार भुजाएं भगवान विष्णु के चार हाथ हैं। इस धारणा के अनुसार, भगवान विष्णु ही स्वस्तिक आकृति में चार भुजाओं से चारों दिशाओं का पालन करते हैं। स्वस्तिक के मध्य में जो बिन्दु है, वह भगवान विष्णु का नाभिकमल यानी ब्रम्हा का स्थान है। स्वस्तिक धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उपासना के लिए भी बनाया जाता है। स्वस्तिक की खड़ी रेखा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग का संकेत देती है। आड़ी रेखा विश्व के विस्तार को बताती है। तों बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को भगवान बुद्ध के चरणों का प्रतीक माना जाता है। जैन धर्म में स्वस्तिक कों पवित्र शुभ का प्रतीक चिह्न् माना गया है।

@ स्वस्तिक का रंग लाल :- भारतीय संस्कृति में लाल रंग का अपना ही महत्व है, लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। सभी मांगलिक कार्यों में लाल रंग का प्रयोग किसी ना किसी रूप में किया जाता है। पूजा के समय सिन्दूर, रोली या कुंकुम के रूप में इस रंग का प्रयोग किया जाता है। लाल टीका तेजस्विता, पराक्रम, गौरव और यश का प्रतीक माना गया है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को दर्शाता है। यह रंग लोगों के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। यह रंग मंगल ग्रह का है जो स्वयं ही साहस, पराक्रम, बल व शक्ति का प्रतीक है। यह सजीवता का प्रतीक है और हमारे शरीर में व्याप्त होकर प्राण शक्ति का पोषक है। मूलतः यह रंग ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति एवं महत्वकांक्षा का प्रतीक है। अत स्वास्तिक कों शुभ के लिए हमेशा लाल रंग से ही अंकित बनाया जाता है ।

@ कहा प्रयोग करे और कहा प्रयोग ना करे – स्वास्तिक शुभ का प्रतीक चिन्ह है,लेकिन इसी शुभ चिन्ह कों जब अनुचित स्थान पर प्रयोग किया जाता है, तों सब कुछ अशुभ होता है । इसलिए स्वस्तिक का प्रयोग शुद्ध, पवित्र एवं सही ढंग से उचित स्थान पर करना चाहिए। शौचालय एवं गन्दे स्थानों पर इसका प्रयोग वर्जित है। ऐसा करने वाले की बुद्धि एवं विवेक समाप्त हो जाता है। दरिद्रता, तनाव एवं रोग एवं क्लेश में वृद्धि होती है। इसका प्रयोग रसोईघर, तिजोरी, स्टोर, प्रवेशद्वार, मकान, दुकान, पूजास्थल एवं कार्यालय में किया जाता है। यह तनाव, रोग, क्लेश, निर्धनता एवं शत्रुता से मुक्ति दिलाता है। भवन, कार्यालय, दूकान या फैक्ट्री या कार्य स्थल के मुख्य द्वार के दोनों ओर स्वास्तिक अंकित करने से सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। पूजा स्थल, तिजोरी, कैश बॉक्स, अलमारी में भी स्वास्तिक स्थापित करना चाहिए। इसके अपमान व गलत प्रयोग से बचना चाहिए।

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